Thursday, June 18, 2015

खींचे वक्त लकीर

अच्छे दिन तो आ गए, लोग बने खुशहाल।
पता नहीँ क्यों खुदकुशी, करे कृषक बेहाल।।

वक्त समझ लो वक्त पर, वक्त बने तकदीर ।
वक्त वक्त की बात है, खींचे वक्त लकीर । ।

गांधी दिल से दूर अब, जाकर टंगे दिवार।
आए फिर वे नोट पर, रुका न भ्रष्टाचार।।

बोझिल कुछ दिन जिन्दगी, प्रियजन होते दूर।
आंसू भी निकले नहीँ, रोने को मजबूर।।

बेहतर तब संबंध जब, प्रीति हृदय में लोच।
प्यारे लगते लोग वे, जिनकी मिलती सोच।।

सह लो खुद की वेदना, भले चुभे ज्यों काँट।
पर अपनी सम्वेदना, नित आपस में बाँट।।

बेजुबान को दोष दे, बनते स्वयं महान।
खुद सुनते पर क्यूँ कहे, दीवारों के कान।।

दीवारें गिरतीं वही, पड़ती जहाँ दरार।
रिश्ते में पड़ती जहाँ, खड़ी करे दीवार।।

Monday, May 25, 2015

लथपथ सर से पाँव तक

गरमी से तन जल रहा, जल बिन सब बेचैन।
पलक पसीना चू रहा, लड़ना मुश्किल नैन।।

निर्धनता के सामने, छोटे हैं सब रोग।
लू, ठंढक, बरसात में, मरते ऐसे लोग।।

लथपथ सर से पाँव तक, तुरत नहाने बाद।
मोल पसीने का बहुत, गरमी से बर्बाद।।

धीरे धीरे उम्र संग, बढता नित संसार।
मंहगाई, गरमी बढी, तेज बहुत रफ्तार।।

गरमी में ही आम को, मिले आम सौगात।
गरमी से गर जूझना, कर ले ठंढी बात।।

हरियाली जितनी अधिक, कम सूरज को क्रोध।
जग में सूरज जब तलक, है जीवन का बोध।।

घडा हृदय से ठंढ क्यों, उत्तर सुन लो भाय।
माटी-तन माटी मिले, गरमी क्यों दिखलाय।।

ऐ सूरज बारिश बुला, आम लोग बेहाल।
भींगे सभी फुहार में, हो धरती खुशहाल।।

जंगल, पर्वत, पेड़ संग, कटे सुमन के बाग।
सूरज का गुस्सा उचित, उगल रहा है आग।।

Sunday, May 24, 2015

इन्सान में गज़ल

चौखट से चलके खेत में खलिहान में गज़ल
निकली है पसीने संग ईमान में गज़ल

मस्ती में चल रही है नंगे ही पाँव से
सूरत पे धूल है पर मुस्कान में गज़ल

परदे में बात कहने की बदला है अब चलन
सीधे ही बात करती उन्वान में गज़ल

शबनम, शराब, प्यार की बातें भी कम हुईं
वो हाथ लिए आईना मैदान में गज़ल

दुनिया के संग बदलेगी रोज ही गज़ल
इन्सान सुमन खोजो इन्सान में गज़ल

Wednesday, May 20, 2015

पैसा दे या प्रेम दे

पैसा दे या प्रेम दे, जितना जिसके पास।
इक तोड़े विशवास को, इक जोड़े विश्वास।।

रिश्ते हों या दूध फिर, तब होते बेकार।
गर्माहट तो चाहिए, समय समय पर यार।।

प्रेम उतरता आंख से, बोल सका है कौन?
भाषा जग में प्रेम की, सदियों से है मौन।।

तल्खी भी गुण एक जो, करता सबल शरीर।
बचा समन्दर इसलिए, खारा उसका नीर।।

दिल में उसकी याद की, नित आती है याद।
यादें तो हैं मौन पर, रोचक है सम्वाद।।

लोग स्वयं गलती करे, भूल नीति ईमान।
नेता या भगवान को, गरियाना आसान।।

आज अदालत के प्रति, प्रायः नहीँ विरोध।
तंत्र भ्रष्ट भीतर वहाँ, सुमन इसी पर क्रोध।।

Sunday, May 17, 2015

जागे कितने लोग

उलझन में सब लोग हैं, यह मन का विज्ञान।
सुख अपना दुख गैर का, कम लगता श्रीमान।।

नहीं बराबर दाल की, घर की मुर्गी आज।
दाल अभी मँहगी हुई, बदलो कहन रिवाज।।

सारे सुख मुझको मिले, ऐसी जब तक सोच।
इसीलिए तैयार सब, कैसे किसको नोच।।

जिसे योग्यता से अधिक, मिल जाता सम्मान।
अक्सर अच्छे लोग का, वो करता अपमान।।

एक पुत्र अफसर बना, बेच रहा इक तेल।
ये किस्मत के खेल हैं, या कर्मों के खेल??

कुछ लोगों को नींद में, चलने का है रोग।
आँखें जिनकी हैं खुली, जागे कितने लोग।।

सभ्य हुए इतने सुमन, फेंक रहे तेजाब।
मना किया लिख के जहां, वहीं करे पेशाब।
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