Saturday, May 26, 2012

देखो फिर से नभ की ओर

चेहरा क्यूँ दिखता कमजोर।
देखो फिर से नभ की ओर।।

तारे जहाँ सदा हँसते हैं,
और चमकता चंदा।
जी सकते तो जी लो ऐसे,
छूटेगा हर फंदा।
आग उगलता सूरज फिर भी,
नित ले आता भोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।

नदियों की खुशियाँ तो देखो,
गीत हमेशा गाती है।
हर विरोध के पत्थर को भी,
सँग बहा ले जाती है।
तब उसकी मस्ती बढ़ती जब,
घटा घिरे घनघोर
देखो फिर से नभ की ओर।।

भले तोड़ ले कोई सुमन को,
फिर भी वह तो हँसता है।
और सुगंध भी कैद नहीं है,
हवा के सँग सँग बहता है।
चिड़ियों की कलरव में धुन है,
मत कहना तू शोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।

Thursday, May 24, 2012

नूर अभी तक आँखों में

वर्षों हमने की है मुहब्बत, नूर अभी तक आँखों में
फिर कैसी है आज अदावत, नूर अभी तक आँखों में

कभी दूर ना हम दोनों थे, इक दूजे की बाँहों से
शेष अभीतक वैसी चाहत, नूर अभी तक आँखों में

जीवन में दोनों पहिये का, मान बराबर हो जाए
तब शायद ही कोई शिकायत, नूर अभी तक आँखों में

घर में हों या फिर महफिल में, आँखों से बतियाते हम
समझे इक दूजे की
नीयत, नूर अभी तक आँखों में

ऐसी अनुपम जोड़ी के पथ, सदियों तक हो सदा सुमन
हर साँसों में ख़ास इनायत, नूर अभी तक आँखों में

Sunday, May 20, 2012

शायद जीवन को मिले एक नया विस्तार


आँगन सूना घर हुआ, बच्चे घर से दूर।
मजदूरी करने गया, छोड़ यहाँ मजबूर।।

जल्दी से जल्दी बनें, कैसे हम धनवान।
हम कुदाल बनते गए, दूर हुई संतान।।

ऊँचे पद संतान की, कहने भर में जोश।
मगर वही एकांत में, भाव-जगत बेहोश।।

कहाँ मिला कुछ आसरा, वृद्ध हुए माँ बाप।
कहीं सँग ले जाय तो, मातु पिता अभिशाप।।

जैसी भी है जिन्दगी, करो सुमन स्वीकार।
शायद जीवन को मिले एक नया विस्तार।।

Thursday, May 17, 2012

जड़ना वही नगीना सीखा

जिसने दुःख में जीना सीखा
जड़ना वही नगीना सीखा

फटेहाल जीवन की गाथा
चिथड़ों को भी सीना सीखा

जीवन को भवसागर कहते
कैसे चले सफीना सीखा

जीवित रहना कम साधन में
सालों साल महीना सीखा

कितने कम हैं खुशियों के पल 
जहर ग़मों का पीना सीखा

बिना परिश्रम भोग, रोग है
निकले सदा पसीना सीखा

चाल अघोषित है जीवन की
नूतन सुमन करीना सीखा

Wednesday, May 9, 2012

सेवा है साहित्य सुमन व्यापार नहीं

लेखन में प्रतिबंध मुझे स्वीकार नहीं
प्रायोजित रचना से कोई प्यार नहीं

बच के रहना साहित्यिक दुकानों से
जी कर लिखता हूँ कोई बीमार नहीं

मठाधीश की आज यहाँ बन आई है
कितने डर से करते हैं तकरार नहीं

धन प्रभाव के बल पर उनकी धूम मची
कितने जिनको साहित्यक आधार नहीं

रचना में ना दम आती विज्ञापन से
ऐसे जो हैं लिखने का अधिकार नहीं

उठे कलम जब दिल में मस्ती आ जाए
खुशबू रचना में होगी इनकार नहीं

खुशबू होगी तो मधुकर भी आयेंगे
सेवा है साहित्य सुमन व्यापार नहीं
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