Monday, February 16, 2015

साँप नेवले यार

सूरज को अभिमान पर, जुगनू में आलोक।
जब जब जीतीं चीटियाँ, हाथी के घर शोक।।

घोषित किया चुनाव जब, जंगल की सरकार।
अचरज में सब, ज्यों बने, साँप नेवले यार।।

जंगल के कानून से, होते कई कमाल।
रानी मधुरस पी रही, मधुमक्खी कंगाल।।

अगर कहीं हक ना मिले, छीन, माँग मत भीख।
चींटी सम हो एकता, देती हरदम सीख।।

धीरे धीरे हो रहीं, चिड़ियाँ सभी सचेत।
बिछे जाल के बीच से, चुग जातीं हैं खेत।।

जंगल सारे जीव का, मत करना अपमान।
कभी कभी, पर टूटता, शेरों का अभिमान।।

ताकत मिलने पर सुमन, मत खोना तुम होश।
कछुआ अक्सर जीतता, हारा है खरगोश।। 

Thursday, February 5, 2015

जिन्दगी की जिन्दगी

रस्ते में कभी प्यार के आया न कीजिए
हो जाए प्यार, वक्त को जाया न कीजिए

मज़हब से नहीं प्यार का होता है वास्ता
गर मिल ही गए उनको सताया न कीजिए

कुर्बानियों से प्यार का होता शुरू सफर
खुशहाल जिन्दगी को डराया न कीजिए

मेहदी नहीं थी सूखी क्यों प्यार थम गया
चाहत को इस तरह से दबाया न कीजिए

है जिन्दगी ही जिन्दगी की जिन्दगी सुमन
फिर खाक में जीवन को मिलाया न कीजिए

गुजरे कल को आज बना लूँ

जी करता सरताज बना लूँ
या अपना हमराज बना लूँ
याद सुमन को मधुर मिलन भी
गुजरे कल को आज बना लूँ

देख सुमन, मकरन्द छुपा है
दुख में भी आनन्द छुपा है
तेरी यादें और तुम्ही में
गीत-गज़ल औ छन्द छुपा है

मुझको तुमसे प्यार नहीं है
कहने को तैयार नहीं है
इक दूजे में क्यों खोये फिर
देख सुमन अय्यार नहीं है

यादों पर इक पहरा दे दे
या माथे पर सेहरा दे दे
खुशी अगर मंजूर नहीं तो
जख्म सुमन को गहरा दे दे

Tuesday, January 27, 2015

मैं कारण भी समाधान मैं

जब जब मैंने गीत लिखा
शब्द - भाव से प्रीत लिखा
उम्र सुमन की गुजर रही
नहीं मिला, मनमीत लिखा

सब मिहनत से बेदम है
आँखों में फिर भी गम है
होता जनहित खेल यहाँ
कौन अभी किससे कम है

मन मन्दिर का आँगन तू
दिल मेरा है, धड़कन तू
उलझन छोड़ो, मत बनना
मिरे प्यार में अड़चन तू

कभी मूर्खता कभी ज्ञान मैं
कभी खुशी भी, परेशान मैं
मुझसे ही दुनिया है कायम
मैं कारण भी समाधान मैं 

Friday, January 16, 2015

मजा लूटता और

नया साल कैसे मने, सब के सब हलकान।
बाँट रहे शुभकामना, ले नकली मुस्कान।।

ले आया नव वर्ष यह, खुशियों की सौगात।
ठिठुर रहे सब ठण्ढ से, और शुरू बरसात।।

दुनिया सूरज से बनी, हर पल सूरज साथ।
सूरज ढँकने के लिए, उठा सुमन मत हाथ।।

गलती अपनी देखना, बहुत कठिन है बात।
दिखलाने में व्यस्त सब, दूजे की औकात।।

लेखन है इक साधना, गिन के रचनाकार।
सजा रहे नित शेष जो, साहित्यिक बाजार।।

आज सभी चालाक हैं, देख सुमन कर गौर।
मिहनतकश भूखा मरे, मजा लूटता और।।

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