Thursday, August 27, 2015

रिश्तों से भारी मतलब

अपना मतलब अपनी खुशियाँ पाने की तैयारी है
वजन बढ़ा मतलब का इतना जो रिश्तों पर भारी है
मातु पिता संग इक आंगन में भाई बहन का प्यार मिला
इक दूजे का सुख दुख अपना प्यारा सा संसार मिला
मतलब के कारण ही यारों बना स्वजन व्यापारी है
वजन बढ़ा मतलब का---------
भीतर से इन्सान वो जैसा क्या बाहर से दिखता है
हालत ये कि सन्तानों संग जिस्म यहाँ पर बिकता है
अपना मतलब पूरा कर लें इसी की मारामारी है
वजन बढ़ा मतलब का---------
जीवन मूल्य बचाना होगा मुल्क बचाने की खातिर
पथ के कांटे चुनने होंगे सुमन सजाने की खातिर
उस मतलब से क्या मतलब जो घर घर की बीमारी है
वजन बढ़ा मतलब का----------

पास आती तो फिर प्यास आती नहीं

खूबसूरत हो कितनी मगर आंख में, 
इक उदासी मुझे रास आती नहीं
चॉद बेमोल दुनिया में है तब तलक,
जब तलक चॉदनी पास आती नहीं
एक दूजे का जब तक सहारा न हो,
जिन्दगी के कटेेंगे ये दिन किस तरह
प्यास मिलने की जगती अगर दूर तू,
पास आती तो फिर प्यास आती नहीं
काम तन से करो या कि मन से करो,
चाहे जो भी करो पर जतन से करो,
बिन पसीने की मंजिल मिले भी अगर
जिन्दगी में खुशी खास आती नहीं
मुझसे बेहतर जमाने में कोई नहीं,
हैं परेशां सभी इसको साबित करें
खूुद की खूबी घटी और गुमां ये हुआ
अब बुराई मेरे पास आती नहीं
जीतना प्यार को सीख ले प्यार से,
जिन्दगी प्यार तो प्यार है जिन्दगी
है सुमन द्वार पर देखता भी मगर,
उसकी खुशबू मेरे श्वास आती नहीं

आखिरी में सुमन तुझको रोना ही है

तेरी पलकों के नीचे ही घर हो मेरा
घूमना तेरे दिल में नगर हो मेरा
बन लटें खेलना तेरे रुखसार पे
तेरी जुल्फों के साये में सर हो मेरा

मौत से प्यार करना मुझे बाद में
अभी जीना है मुझको तेरी याद में
तेरे दिल में ही शायद है जन्नत मेरी
दे जगह मै खड़ा तेरी फरियाद में

मानता तुझको मेरी जरूरत नहीं
तुमसे ज्यादा कोई खूबसूरत नहीं
जहाँ तुमसे मिलन वैसे पल को नमन
उससे अच्छा जहां में मुहूरत नहीं

जिन्दगी जब तलक प्यार होना ही है
यहाँ पाने से ज्यादा तो खोना ही है
राह जितना कठिन उतने राही बढे
आखिरी में सुमन तुझको रोना ही है

रिश्ता भी व्यापार

रोटी पाने के लिए, जो मरता था रोज।
मरने पर चंदा हुआ, दही, मिठाई भोज।।

बेच दिया घर गांव का, किया लोग मजबूर।
सामाजिक था जीव जो, उस समाज से दूर।।

चाय बेचकर भी कई, बनते लोग महान।
लगा रहे चूना वही, अब जनता हलकान।।

लोक लुभावन घोषणा, नहीं कहीं ठहराव।
जंगल में लगता तुरत, होगा एक चुनाव।।

भौतिकता में लुट गया, घर, समाज, परिवार।
उस मिठास से दूर अब, रिश्ता भी व्यापार।।

Wednesday, August 12, 2015

घर मेरा है नाम किसी का

घर मेरा है नाम किसी का
और निकलता काम किसी का

मेरी मिहनत और पसीना
होता है आराम किसी का

कोई आकर जहर उगलता
शहर हुआ बदनाम किसी का

गद्दी पर दिखता है कोई
कसता रोज लगाम किसी का

लाखों मरते रोटी खातिर
सड़ता है बादाम किसी का

जीसस, अल्ला जब मेरे हैं
कैसे कह दूँ राम किसी का

साथी कोई कहीं गिरे ना
हाथ सुमन लो थाम किसी का
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