Wednesday, March 25, 2015

खुद को नित पहचान

श्रम जीवन की डोर तो, है पतंग इक ख्वाब।
जीवन अगर सवाल है, मिलता यहीं जवाब।।

हँसकर जीने की कला, कितने को मालूम?
जिसने सीखा, जी लिया, शेष रहे महरूम।।

बिना प्रेम क्या जिन्दगी, प्रेम जगत सौगात।
मगर प्रेम के गीत में, अक्सर गम की बात।।

सिर्फ सांस जीवन नहीं, साथ होश औ जोश।
सांसें उनकी भी चले, अक्सर जो बेहोश।।

रिश्तों से जीवन चले, रिश्ता है विश्वास।
तार तार रिश्ते हुए, उन पे शक जो पास।।

जुदा हुए आंसू गिरे, कहीं मिलन से भाय।
सज्जन, दुर्जन भेद पर, आंखें नम हो जाय।।

जीवन के हर रंग में, खुद को नित पहचान।
सुमन रंग के खेल में, मिट जाते इन्सान।।

चोरों के घर जश्न

चोरी कैसे रुक सके, उठा सामने प्रश्न।
थाना ज्यों बनना शुरू, चोरों के घर जश्न।।

अस्पताल सरकार का, जाते नहीं मरीज।
अगर कहीं जाना पडे, बन जाते नाचीज।।

वफादार कुत्ता बहुत, कहते नहीं अघाय।
कुत्ते जैसी मौत हो, किसको भला सुहाय।।

सम्बोधन गदहा करे, प्रायः चलन रिवाज।
मानव के व्यवहार पर, गधे को एतराज।।

पुलिस पास मत जाइये, कहते सारे संत।
आज तलक ना हो सका, जुर्म पुलिसिया अंत।।

जंगल से बदतर हुआ, मानव सभ्य समाज।
कहता पूर्वज मैं नहीं, रो कर बन्दर आज।।

रक्षक हो जब सामने, किसको नहीं सुहाय?
मगर बुरा तब क्यों लगे, पुलिस द्वार आ जाय।।

अपनेपन के भाव में, दिया स्वजन को कर्ज।
वापस अबतक ना किया, निभा रहा है फर्ज।।

सुमन दिलासा दे उन्हें, हो कर गंजा रोय।
बाल न बांका कर सके, जौं जग बैरी होय।।

Wednesday, March 18, 2015

ऐसे भी और वैसे भी

गड्ढे में तो गिरना ही था, ऐसे भी और वैसे भी
शादी मुझको करना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

भाई बहन से किया शरारत बचपन में शैतान बहुत
बीबी से तो डरना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

कई लोग ससुराल में बसते मेरे घर ससुराल बसा
बिना मौत के मरना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

आज़ादी का ख्वाब देखते शादी कर के यार मेरे
कैद तुम्हें तो चुनना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

निडर सुमन होकर मंचों पर ऐसी रचना पढ़ जाते
घर में तो चुप रहना ही था, ऐसे भी और वैसे भी 

Tuesday, March 3, 2015

हिंगलिश दोहे (मुआफी की अपील के साथ)

घटिया खाना, गन्दगी, Train चले नित Late
फिर लोगों में Hope क्यों, निकले Train Bullet

मंहगाई सुरसा बनी, बढती जाती Rate
रोटी शायद ना मिले, मिले मुफ्त में Net

Rate बढा हर चीज का, घटा Man का Rate
बिके जिस्म हर Rate पर, आग लगी जब पेट

जो Oppose में आज तक, कल हो जाते Set
इसी तरह Leader किया, People का आखेट

जहाँ Emotion जो हुआ, कर देता Update
Writer से ज्यादा सुमन, Reader होता Great

Sunday, March 1, 2015

भाई अच्छा कौन?

अहंकार से मिट गए, नहीं बना जो हंस।
परिणति इनकी देख लो, रावण कौरव कंस।।

सीता थी विद्रोहिणी, तोड नियम उपहास।
राम संग सुख छोडकर, चली गयी वनवास।।

ऑखें पर अंधा हुए, फॅसा मोह में प्राण।
पुत्र-मोह धृतराष्ट्र का, इसका एक प्रमाण।।

कहीं विभीषण था मुखर, कुम्भकरण था मौन।
रावण पेशोपेश में, भाई अच्छा कौन?

बेबस क्यों दरबार में, भीष्म द्रोण सम वीर।
कुछ न बोले हरण हुआ, द्रुपदसुता का चीर।।

गान्धारी को ऑख पर, देखी ना संसार।
पतिव्रता या मूर्खता, निश्चित करें विचार।।

दुर्दिन तो भाता नहीं, नेक बात, सन्देश।
दुर्योधन ने कब सुना, कान्हा का उपदेश।।

मूक नहीं सीता कभी, जब तब किया प्रहार।
साहस था तब तो गयी, लक्ष्मण-रेखा पार।।

लाख बुराई हो भले, रावण था विद्वान।
राम स्वतः करते रहे, दुश्मन का सम्मान।।
हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!