Sunday, September 14, 2014

चेहरे पर ही धूल है

वे खोजे महबूब चाँद में हाल जहाँ माकूल है 
रोटी में जो चाँद निहारे क्या भूखों की भूल है

लोग सराहे जाते वैसे जनहित में जो खड़े अभी
अगर साथ चलना तो कहते, रस्ते बहुत बबूल है

अपने अपने तर्क सभी के खुद की गलती छुप जाए
गलती को आदर्श बनाकर कहते यही उसूल है

सूरत कैसी अपनी यारो देख नहीं पाया अबतक
समझ न पाया दर्पण पे या चेहरे पर ही धूल है

माँ की ममता का बँटवारा सन्तानों में सम्भव क्या
कहीं पे रौनक कहीं उदासी, कैसा नियम रसूल है

किसी के कंधे अर्थी देखो दूजे पर दिखती डोली
रो कर लोग विदा करते पर दोनों पर ही फूल है

संघर्षों में चलता जीवन सोच समझकर चला करो
शायद सुमन कहीं मिल जाए बाकी सब तिरशूल है

Monday, July 21, 2014

सहने लायक ही दूरी दे

रात मुझे इक सिन्दूरी दे
या मरने की मंजूरी दे

पागल होकर मर ना जाऊँ
सहने लायक ही दूरी दे

होते लोग हजारों घायल
खास नज़र की वो छूरी दे

खुशी बाँटना मत किश्तों में
खुशियाँ पूरी की पूरी दे

तुम संग जी ले सुमन खुशी से
ना जीने की मजबूरी दे

खुद को खुद से नंगा देख

अपने भीतर गंगा देख
खुद को खुद से नंगा देख

खुशी खुशी तू गम को जी
तब जीवन सबरंगा देख

भारत सोने की चिड़िया?
कदम कदम भिखमंगा देख

शब्दों में भाई भाई
पर आपस में दंगा देख

खुद जी ले, जीने भी दे
सुमन सभी को चंगा देख

Saturday, July 12, 2014

जनता फाँके धूल

बेटे की शादी हुई, सुमन लगाकर आस।
सास बहू बनती गयी, आज बहू ही सास।।

पुत्र बसा ससुराल में, सुमन हृदय अवसाद।
खुशी हुई जब आ बसा, अपने घर दामाद।।

नेता या अफसर बड़े, प्रश्न आज का मूल।
दोनों ही चालाक हैं, जनता फाँके धूल।।

घर बाहर दोनों जगह, देख सुमन क्या हाल।
बाहर तो बेहाल सब, घर में भी बेहाल।।

मिश्री मुँह में घोलकर, वचन सदा तू बोल।
धन दौलत बेकार है, व्यवहारों का मोल।।

जीवन जी भर जी सके, सबका है संसार।
सुमन सिसकते लोग का, छीनो मत अधिकार।।

Thursday, July 10, 2014

होठों से सम्वाद न कर

मौसम को बर्बाद न कर
बाँहों से आजाद न कर

खुशियों के पल होते कितने?
जी ले पर अवसाद न कर

किसने समझा है जीवन को
चिन्ता को आबाद न कर

सभी सीखते बुरे दिनों से
गम को हरदम याद न कर

आँखों से कर बात प्रणय की
होठों से सम्वाद न कर

हृदय प्रेम तो सजन मिलेंगे
उनसे भी फरियाद न कर

कैसी लगी सुमन की रचना?
हर कविता पे दाद न कर
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