मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।
कहने को होते कुछ अपना।
लेकिन सच अपनापन सपना।
समझौता लाखों कर लें पर,
रहता जीवन में अनबन-सा।
मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।
अनजाने में प्यार किसी से।
क्या जीवन-व्यवहार उसी से?
इस उलझन में उलझ के जीवन,
बनता पतझड़ के उपवन-सा।
मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।
जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।
रोज सीखते जो जीवन से।
संघर्षों से, स्पन्दन से।
उस पलास का जीवन कैसा?
जीता खुशबू-हीन सुमन-सा।
मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।
स्मृति दीर्घा: --संजीव 'सलिल'
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स्मृति दीर्घा:
संजीव 'सलिल'
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स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग...
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पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन.
मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन ...
1 day ago





