Saturday, January 25, 2014

रोते कितने लोग यहाँ

इस माटी का कण कण पावन।
नदियाँ पर्वत लगे सुहावन।
मिहनत भी करते हैं प्रायः सब करते हैं योग यहाँ।
नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।।

ये पंजाबी वो बंगाली।
मैं बिहार से तू मद्रासी।
जात-पात में बँटे हैं ऐसे,
कहाँ खो गया भारतवासी।
हरित धरा और खनिज सम्पदा का अनुपम संयोग यहाँ।
नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।।

मैं अच्छा हूँ गलत है दूजा।
मैं आया तो अबके तू जा।
परम्परा कुछ ऐसी यारो,
बुरे लोग की होती पूजा।
ऐसा लगता घर घर फैला ये संक्रामक रोग यहाँ।
नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।।

सच्चाई का व्रत-धारण हो।
एक नियम का निर्धारण हो।
अवसर सबको मिले बराबर,
नहीं अलग से आरक्षण हो।
मिलकर सभी सुमन कर पाते सारे सुख का भोग यहाँ
नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।।

Thursday, January 23, 2014

नींद तुम्हारी आँखों में

नींद तुम्हारी आँखों में पर मैंने सपना देखा है
अपनों से ज्यादा गैरों में मैंने अपना देखा है

किसे नहीं लगती है यारो धूप सुहानी जाड़े की
बर्फीले मौसम में टूटे दिल का तपना देखा है

बड़े लोग की सर्दी - खाँसी अखबारों की सुर्खी में
फिक्र नहीं जनहित की ऐसी खबर का छपना देखा है

धर्म-कर्म पाखण्ड बताकर जो मंचों से बतियाते
उनके घर में अक्सर यारो मन्त्र का जपना देखा है

चुपके से घायल करते फिर अपना बनकर सहलाते
हाल सुमन का जहाँ पे ऐसा वहीं तड़पना देखा है

Friday, January 17, 2014

कौन यहाँ पर कातिल है

भले सितारे हो गर्दिश में मगर सितारों पे दिल है
पता नहीं रखवाला मेरा कौन यहाँ पर कातिल है

नदी अगर दुनिया को कहते जीवन है उसका पानी
मस्त जिन्दगी धारा जैसी सुख दुख दोनो साहिल है

चलते फिरते कठपुतली सी होठों पे मुस्कान लिए
भागमभाग मची आपस में पता नहीं क्या मंजिल है

रंग बिरंगे परिधानों में गाजे बाजे बजा रहे
भाव मशीनों के जैसा तो सूनी सूनी महफिल है

सुन लेते जो गौर से अक्सर ऐसे लोग कहाँ मिलते
सुमन बोलकर साबित करता बाकी दुनिया जाहिल है

"आप" हुए मदहोश

 आम आदमी के लिए, कौन आम या खास।
तोड़ा है सबने सुमन, आम लोग विश्वास।।

आम आदमी नाम से, बना सुमन दल एक।
धीरे धीरे खो रहा, अपना नित्य विवेक।।

दाँव-पेंच फिर से वही, वही पुराना राग।
आम आदमी पेट में, सुमन जली है आग।।

बड़बोले, स्वारथ भरे, जुटे अचानक लोग।
आम आदमी का सुमन, भला मिटे कब रोग।।

वादे थे अच्छे सुमन, लोग लिया आगोश।
दिल्ली की गद्दी मिली, "आप" हुए मदहोश।।

Monday, January 13, 2014

हाथ सुमन बेलन जहाँ

भला भोर की नींद यूँ, किसको नहीं सुहाय।
मगर सुमन आदेश है, झटपट लाओ चाय।।

पहले तू कुछ काम कर, फिर कविता का जाप।
सुमन बोलती प्यार से, बरतन माँजो आप।।

शादी कर या ना करो, दोनों हाल दुरूह।
हाथ सुमन बेलन जहाँ, वहीं काँपती रूह।।

श्यामल से कहती सुमन, जीना हो गर साथ।
साँझ, सकारे साफ कर, झाड़ू लेकर हाथ।।

आँच लगाओ ठीक से, धीमी कर लो आग।
धो कर काटो तब सुमन, डाल कड़ाही साग।।

काम निबट ले झट सुमन, फिर जाओ बाजार।
भोज सखी घर आज है, करना मुझे सिंगार।।

"सुपर मेन" शादी किया, बना है "जेंटल मेन"
"वाच मेन" कुछ दिन सुमन, अब तो "डोबर मेन"।।

नोट - १ - साग - शाक (कालान्तर और क्षेत्रीयता के हिसाब से परिवर्तित और प्रचलित)
         २ - हिन्दी छन्द में अंग्रेजी शब्द के प्रयोग के लिए मुआफी की अपील के साथ
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