Tuesday, December 22, 2009

मन-मीत

‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

कहने को होते कुछ अपना।
लेकिन सच अपनापन सपना।
समझौता लाखों कर लें पर,
रहता जीवन में अनबन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

अनजाने में प्यार किसी से।
क्या जीवन-व्यवहार उसी से?
इस उलझन में उलझ के जीवन,
बनता पतझड़ के उपवन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

रोज सीखते जो जीवन से।
संघर्षों से, स्पन्दन से।
उस पलास का जीवन कैसा?
जीता खुशबू-हीन सुमन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

Monday, December 21, 2009

इन्तजार है

कहना कठिन हुआ कि मुझे तुमसे प्यार है
न कहा, नहीं खबर ही मगर इन्तजार है

शाखों से लिपटी बेल को देखा जो ख्वाब में
क्या ख्वाब पूरे होंगे ये दिल बेकरार है

हालात दिल का समझा आँखों में डूबकर
दुनिया समझ न पायी क्या अख्तियार है?

टकराना पर्वतों से या इश्क हो किसी से
परिणाम दर्द मिलता, जो बेशुमार है

जो इश्क न किया तो ये जिन्दगी अधूरी
हर हाल में सुमन को भ्रमर स्वीकार है

Friday, December 18, 2009

वही बात कहो

वो कहे रात अगर दिन को नहीं रात कहो
लबों पे आ के जो रूक जाये वही बात कहो

हैं राज दिल में कई जिसको बताना मुश्किल
छलक पड़े यदि आँखों से तो सौगात कहो

बसाया दिल में जिसे वो भी बेवफा निकला
बचा है प्यार अगर दिल में तो जज्बात कहो

खो करके चाँदनी में तारे भी रो पड़े
हुई है कैसी हमसफर की मुलाकात कहो

बनाया मीत जो काँटों को है मुश्किल जीना
महसूस कर सुमन की हालात कहो

Tuesday, December 15, 2009

इश्क चढ़ता गया

उम्र बढ़ती गयी इश्क चढ़ता गया
ख्वाब सजते रहे दिन गुजरता गया

उम्र छोटी बहुत जिस्म से प्यार की
इश्क आँखों से आकर निखरता गया

उलझनों में उलझने की फितरत नहीं
प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया

चाँदनी रात में कुमुदिनी सो गयी
चाँद का जो चमन था उजड़ता गया

बात ईमान की आधुनिकता नहीं
बस यहीं पर सुमन भी पिछड़ता गया

Sunday, December 13, 2009

वक्त नहीं मेरे पास

सभी आधुनिक सुख पाने को हरदम करे प्रयास।
इस कारण से रिश्ते खोये आपस का विश्वास।
भैया जी ऽऽऽऽऽऽऽ क्योंकि वक्त नहीं मेरे पास।।

उनसे बात नहीं होती थी जो बसते परदेश में।
क्या मिठास अपनापन भी था चिट्ठी के संदेश में?
अब तो बातें हर पल सम्भव, क्या वैसा एहसास?
भैया जी ऽऽऽऽऽऽऽ क्योंकि वक्त नहीं मेरे पास।।

बच्चों के भी नामकरण का पहले बहुत विधान।
सम्भव आने वाले कल से नम्बर हो पहचान।
कोमल भाव हृदय के तब तो होंगे सदा उदास।
भैया जी ऽऽऽऽऽऽऽ क्योंकि वक्त नहीं मेरे पास।।

जिस चाहत में काम करें हम हो करके मजबूर।
ये भी सच की इस चक्कर में बहुत खुशी से दूर।
सुमन फँसा हो काँटों में जब क्या खुशियों की आस।
भैया जी ऽऽऽऽऽऽऽ क्योंकि वक्त नहीं मेरे पास।।
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