Friday, April 24, 2015

मिला दूध में नीर

है पानी में दूध या, मिला दूध में नीर।
बसा कौन है प्राण में, किसका व्यक्त शरीर?

आग जहाँ पर है धुआँ, अक्सर कहते लोग।
धुआँ बिना भी आग तब, दिल से दिल का रोग।।

लोग चाहते किस तरह, खुशियाँ मिले अपार।
हँसी खोजने के लिए, घूम गली-बाजार।।

आज तलक जो भी कहा, खुशी खुशी मंजूर।
जो मेरे आदर्श थे, वो करनी से दूर।।

अधिग्रहण हो भूमि का, इक प्रस्ताव नवीन।
चेत कृषक सरकार अब, छीने खेत जमीन।।

बी० पी० एल० को भूलकर, आई० पी० एल० की बात।
रोटी पर आफत, उधर, पैसों की बरसात।।

भगवन के घर देर पर, वहाँ नहीं अंधेर।
देर लगे अंधेर सा, फिर क्यूँ करते देर??

खुशियों सूरत पे नहीं, कल जैसा वो आज।
कई सुमन अक्सर मिले, दुनिया से नाराज।।

Friday, April 17, 2015

मचा हुआ कोहराम समन्दर

रस्ता मांगा राम समन्दर
नहीं दिया, बदनाम समन्दर
पास तुम्हारे हरदम देखा
मचा हुआ कोहराम समन्दर
सोच रहा क्या नहीं चाहिए
तुझे कभी आराम समन्दर
मेल तुम्हारा सूरज के संग
है प्यारा अभिराम समन्दर
दुनिया वाले सोये, जागे
करता रहता काम समन्दर
मीठापन आने तक सर को
पटको सुबहो-शाम समन्दर
साथ सुमन तो जीत मिलेगी
बदलो मत आयाम समन्दर

बिखरा हुआ समाज दिखा

प्यार और नफरत समझाने का बेहतर अंदाज दिखा
बातें जितनी अच्छी करते उलट आंख में राज दिखा
जीव कई सामाजिक होते सर्वश्रेष्ठ आदम जिसमें
वन में नियम मगर मानव का बिखरा हुआ समाज दिखा
देखा,समझा,महसूसा भी दशकों से इस दुनिया को
हाल कभी ऐसा न देखा सचमुच जैसा आज दिखा
सेवक ही शोषण करते और शासन भी शीतल घर से
आज तलक उनकी आंखों में कभी न कोई लाज दिखा
आग लगी बाहर जलने दो अपना घर तो बचा हुआ
इस कारण से सुमन को शायद केवल अपना काज दिखा

कुछ फर्ज निभाना बाकी है

ऐ वक्त जरा धीरे चलना कुछ फर्ज निभाना बाकी है
इस दुनिया में आया मैं भी यह दर्ज कराना बाकी है
मिलके आपस जी लें सब कोशिश है ऐसी दुनिया की
जो छुप जाए मुस्कानों में वो दर्द मिटाना बाकी है
बेहतर इंसान बने कैसे सीखा आकर इस दुनिया में
आगे भी पीढी हो बेहतर ये कर्ज चुकाना बाकी है
संकट ऐसा विश्वासों का होते रहते घायल रिश्ते
दुनिया को बचाने की खातिर ये मर्ज भगाना बाकी है
पहचान वक्त की वक्त पे हो ये वक्त सिखाता रोज सुमन
ऐ दुनिया वाले समझ इसे ये अर्ज सुनाना बाकी है

इक बार सताने आ जाओ

गफलत में जीने वालों का एहसास जगाने आ जाओ
पलकें जागी जो सदियों से एकबार सुलाने आ जाओ
जब तुम से हुई जुदाई तो आंसू ने साथ नहीं छोडा
इक बार गुजारिश मेरे संग आंसू में नहाने आ जाओ
मिल जाते सपनों में आकर ये मिलना भी क्या मिलना है
इक आग विरह की दिल में जो उसको सुलगाने आ जाओ
मजबूर हैं हम मजबूर हो तुम ये जीना भी क्या जीना है
ऐसी तैसी मजबूरी की दुनिया को दिखाने आ जाओ
जो साथ सुमन का ना पाया वो कीमत इसकी क्या जाने
है दिल से खुशामद प्रियतम से इक बार सताने आ जाओ
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