Friday, January 16, 2015

मजा लूटता और

नया साल कैसे मने, सब के सब हलकान।
बाँट रहे शुभकामना, ले नकली मुस्कान।।

ले आया नव वर्ष यह, खुशियों की सौगात।
ठिठुर रहे सब ठण्ढ से, और शुरू बरसात।।

दुनिया सूरज से बनी, हर पल सूरज साथ।
सूरज ढँकने के लिए, उठा सुमन मत हाथ।।

गलती अपनी देखना, बहुत कठिन है बात।
दिखलाने में व्यस्त सब, दूजे की औकात।।

लेखन है इक साधना, गिन के रचनाकार।
सजा रहे नित शेष जो, साहित्यिक बाजार।।

आज सभी चालाक हैं, देख सुमन कर गौर।
मिहनतकश भूखा मरे, मजा लूटता और।।

Wednesday, December 24, 2014

हर पल नया सबेरा हो

तेरा हो या मेरा हो
हृदय प्रेम का डेरा हो

खुद को पात्र बना ले यूँ
जैसे कुशल ठठेरा हो

जीवन में संघर्ष मुदा
अनुशासन का घेरा हो

खुद जीना दीपक जैसे
जाओ जहाँ अंधेरा हो

जीओ खतरे में ऐसे
जैसे चतुर सपेरा हो

वाणी में आकर्षण भी
ऐसा लगे चितेरा हो

सीख सुमन तू यूँ जीना
हर पल नया सबेरा हो 

हर विरोध के स्वर मेरे हैं

भले रजाई में लिपटे हम घर से बाहर जाना छोड़
स्वाभाविक दाँतों के सरगम गाना और बजाना छोड़
कल तक सबको जला रहे थे इस ठंढे में कहाँ हो गुम
दिनभर साथ सुमन के रहना ऐ सूरज मत आना छोड़

जाड़े का मौसम प्रिय उनको जो इण्डिया में रहते हैं
भारत में रहने वाले तो बस ठिठुरन ही सहते हैं
ये अन्तर कैसे मिट पाये, सच्ची कोशिश नहीं हुई
पर दशकों से संसद में सब बात यही तो कहते हैं

अबतक उलझा उदर-भरण में क्या जीवन भगवान मिला
जीना मरना जिनकी खातिर उनसे ही अपमान मिला
बोध - कथा बिच्छू - साधु की, पर जीना साधु बनकर
जो "अपने" वे हँसकर कहते देख सुमन नादान मिला

अपनी मिहनत से परिजन को सारी खुशियाँ हम देते हैं
परिजन को भी ये शक है कि खुशियाँ कितनी कम देते हैं
बरसातों में प्यासी धरती जाड़े में बरसात अधिक
सुमन की दुनिया घर जैसे ही खुदा भी क्या मौसम देते हैं 

ना कोई घर अपना लेकिन सारी दुनिया घर मेरे हैं
प्रेम अगर विस्तारित हो तो सारे गाँव नगर मेरे हैं
पेट पीठ हैं सटे सुमन के तन पर वस्त्र नहीं दिखते
हो निजात बस इस हालत से हर विरोध के स्वर मेरे हैं

Wednesday, December 17, 2014

आँखों आँखों में महसूसो

कैसे कह दूँ प्यार नहीं है
बंधन भी स्वीकार नहीं है

दिल में तेरी यादें हरदम
मन पर ही अधिकार नहीं है

कुछ खोया तो पाया भी कुछ
प्यार कभी बेकार नहीं है

प्यार सलामत अगर जिन्दगी
सूना ये संसार नहीं है

आँखों आँखों में महसूसो
प्यार कभी व्यापार नहीं है

यह मेरा है सब कहते पर
अपना तो घर द्वार नहीं है

सुमन मुहब्बत और फकीरी
सम तो है शमसार नहीं है

Sunday, December 7, 2014

आँसू को पानी कहता है

जो खुद को ज्ञानी कहता है
आँसू को पानी कहता है

रोज बटोरा, भरी तिजोरी
अपने को दानी कहता है

माँगा उसने, दिया सहारा
फिर क्यों मनमानी कहता है

जोश जोश में कदम उठाकर
अपनी नादानी कहता है

काम सुमन के सारे अच्छे
उसको बेमानी कहता है
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