Wednesday, April 17, 2013

फिर भी छोटा आँगन है

आपस में अपनापन है
फिर भी छोटा आँगन है

मुख पर खुशियों का विज्ञापन
पर आँखों में सावन है

खुशियों के पल और शबनम का
कितना त्वरित समापन है

माँगों में सिन्दूर भरे हैं
दिखती क्यों वैरागन है

सुमन चतुर इस युग के रावण
सचमुच राम खेलावन है

Thursday, April 11, 2013

रामजी कब आओगे?

फिर से करने तुम राज, रामजी कब आओगे?
है पूजित रावण आज, रामजी कब आओगे?

निज कर्मों से सिखलाया, नारी का मान बढ़ाया
लुटती सीता की लाज, रामजी कब आओगे?

हक धोबी को भी बोले, निज मन की गाँठें खोले
अब घुटती है आवाज, रामजी कब आओगे?

भाई का कातिल भाई, रोती कौशल्या माई
है बिखरा हुआ समाज, रामजी कब आओगे?

मन्दोदरी ने समझाया, रावण उसको धमकाया
अब घर घर यही रिवाज, रामजी कब आओगे?

तेरे भरत, लखन जी भ्राता, पर तू सबको अपनाता
संकट में जगत-जहाज, रामजी कब आओगे?

सेवक जब मारुतिनन्दन, नित करे विभीषण वन्दन
फिर से लो सुमन का ताज, रामजी कब आओगे?

Tuesday, April 9, 2013

नए सपने भी पल रहे कितने

दिल में अरमान जल रहे कितने
नए सपने भी पल रहे कितने

देख गिरगिट ने खुदकुशी कर ली
रंग इन्सां बदल रहे कितने

यूँ तो अपनों के बीच रहते हम
फिर भी आँसू निकल रहे कितने

चाँद पाने की दिल में ख्वाहिश ले
चाँद जैसे बदल रहे कितने

हजारों दोस्त मिलेंगे सिर्फ कहने को
दुख के दिन में असल रहे कितने

मौत परिचय बताती जीवन का
कोई जी कर सफल रहे कितने

इस हकीकत से रू-ब-रू है सुमन
हाल बदले, ऊबल रहे कितने

Wednesday, February 6, 2013

गीत का उनवान देखिये

भक्तों को बनाते हैं वो नादान देखिये
अब छोड़िये भगवान को इन्सान देखिये

सुन्दर से लिखा द्वार पे सेवा ही धरम है
मिलते ही उनके दिल का शैतान देखिये

कुदरत से मिली नेमतों की फिक्र है किसे
भगवान के वरदान का अपमान देखिये

चिड़ियाँ चहक रहीं थीं और खो गया था मैं
कलरव में छिपे गीत का उनवान देखिये

खुद से भी लड़ रहे हैं दुनिया से अनवरत
होते नहीं सुमन कभी हलकान देखिये

Friday, January 18, 2013

मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं

मौत आती है आने दे डर है किसे, मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं
बाँटते ही रहो प्यार घटता नहीं, माप लेना तू सौ बार कम तो नहीं

गम छुपाने की तरकीब का है चलन, लोग चिलमन बनाते हैं मुस्कान की
पार गम के उतर वक्त से जूझकर, अपनी हिम्मत पे अधिकार कम तो नहीं

था कहाँ कल भी वश में ना कल आएगा, हर किसी के लिए आज अनमोल है
कई रोते मिले आज, कल के लिए, उनके चिन्तन का आधार कम तो नहीं

लोग धरती पे आते हैं रिश्तों के सँग, और बनाते हैं रिश्ते कई उम्र भर
टूट जाते कई उनमे क्यों सोचना, कहीं आपस का व्यापार कम तो नहीं

जिन्दगी होश में है तो सब कुछ सही, बोझ माना तो हर पल रुलाती हमे
ये समझकर अगर तू न समझा सुमन, तेरी खुशियों का संसार कम तो नहीं।
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